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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: संपत्ति के अधिकार पर बड़ा निर्णय
नई दिल्ली: 5 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि सरकार किसी भी निजी संपत्ति को सामुदायिक भौतिक संसाधन मानकर उसका अधिग्रहण या पुनः बंटवारा नहीं कर सकती। यह महत्वपूर्ण निर्णय संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के तहत सुनवाई के दौरान लिया गया। अदालत ने संपत्ति के अधिकार और समाज में संपत्ति के वितरण के संबंध में महत्वपूर्ण बातें उठाई। इस निर्णय के परिणामस्वरूप संपत्ति से जुड़ी कई कानूनी बहसों और विवादों में नया मोड़ आ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और संविधान का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय में दो प्रमुख मुद्दे थे। पहला यह कि क्या संविधान के अनुच्छेद 31-C में किए गए संशोधन अभी भी प्रभावी हैं, और दूसरा यह कि अनुच्छेद 39-B की व्याख्या क्या है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के संपत्ति अधिग्रहण और वितरण की नीति पर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए, जो समाज की भलाई के उद्देश्य से संपत्ति के अधिकार का सम्मान करता है।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 7:2 के बहुमत से यह फैसला सुनाया। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस धूलिया ने अलग राय व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय उस समय दिया जब संपत्ति के अधिकारों और सरकारी नीतियों के बीच संघर्ष बढ़ता जा रहा था।
अनुच्छेद 31-C और संपत्ति के अधिकार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31-C का संबंध राज्य के नीति निर्देशक तत्वों और मौलिक अधिकारों से है। इस अनुच्छेद के तहत सामाजिक भलाई के उद्देश्य से बनाए गए कानूनों को सुरक्षा दी जाती है। यह 25वें संविधान संशोधन, 1971 के बाद से संविधान में शामिल किया गया था, जब न्यायालय ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के निर्णय को खारिज कर दिया था।
इंदिरा गांधी के दौर में संशोधन
साल 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने अनुच्छेद 31-C के दायरे को बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद से यह विषय बहस का हिस्सा बन गया। संविधान में संपत्ति के अधिकार को लेकर कई संशोधन किए गए, जिनके तहत सरकार को संपत्ति अधिग्रहण का अधिकार तो मिला, लेकिन नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी की गई।
संपत्ति के अधिकार का वर्तमान परिप्रेक्ष्य
आज के समय में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(f) और अनुच्छेद 31 के तहत संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना जाता है। 44वें संशोधन (1978) के तहत संपत्ति का अधिकार अब एक विधिक अधिकार (Legal Right) के रूप में स्वीकार किया गया है। अनुच्छेद 300-A के तहत नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है कि कोई भी व्यक्ति उनकी संपत्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के छीन नहीं सकता।
अनुच्छेद 39(बी) और सरकारी नीतियाँ
संविधान का अनुच्छेद 39(बी) समाज के संसाधनों के उचित वितरण की बात करता है, ताकि सभी वर्गों को समान रूप से लाभ मिल सके। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार की नीतियाँ इस सिद्धांत पर आधारित हों, जिससे संपत्ति का वितरण न्यायपूर्ण तरीके से किया जाए। यही कारण है कि सरकार विभिन्न कानूनों के माध्यम से संपत्ति पर नियंत्रण रखने की कोशिश करती है।
संपत्ति अधिग्रहण और राजनीति
हाल ही में संपत्ति अधिग्रहण और वक्फ की जमीनों के विवादों के कारण यह मामला और भी संवेदनशील बन गया था। खासकर लोकसभा चुनावों के दौरान यह आरोप लगे थे कि यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो वह जमीनें अन्य अल्पसंख्यकों में बांट देगी। हालांकि, कांग्रेस के मैनिफेस्टो में ऐसा कोई वादा नहीं था। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार को किसी भी संपत्ति को अधिग्रहित करने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
संपत्ति के अधिकार और ऐतिहासिक घटनाएँ
पहले संविधान में संपत्ति के अधिकार को एक मौलिक अधिकार माना गया था, जिसे बाद में संशोधन के द्वारा हटा दिया गया। इसका कारण यह था कि सरकार को सार्वजनिक हित के लिए संपत्ति अधिग्रहित करने का अधिकार था, जिससे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता था। 1978 में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटा दिया गया, लेकिन इसे कानूनी अधिकार के रूप में सुरक्षित किया गया।
महाराष्ट्र के केस से उभरा यह मामला
मौजूदा मामला महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास अधिनियम (महाडा) के 1986 में किए गए संशोधन से जुड़ा है। इस संशोधन ने राज्य सरकार को मुंबई में पुरानी इमारतों का अधिग्रहण करने का अधिकार दिया था, ताकि वे इमारतों को सुधार सकें और पुनः निर्माण कर सकें। इस संशोधन के खिलाफ प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचा, जहां यह फैसला लिया गया।
भूमि अधिग्रहण और सरकारी विवाद
संपत्ति अधिग्रहण का मुद्दा हमेशा ही विवादों से भरा रहा है। 2013 में कांग्रेस की यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव की कोशिश की थी, लेकिन इसे भारी विरोध का सामना करना पड़ा। इसके बाद बीजेपी की सरकार भी इस कानून में बदलाव की चाहत रखती थी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने संपत्ति के अधिकार पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। सरकार को संपत्ति अधिग्रहण और वितरण में न्यायपूर्ण प्रक्रिया का पालन करना होगा, ताकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। इस फैसले से सरकार के भूमि अधिग्रहण के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ेगा, और यह सुनिश्चित करेगा कि सरकारी नीतियाँ समाज के भले के लिए हों, न कि किसी विशेष वर्ग या व्यक्ति के फायदे के लिए।